Who is she a real ghost story
 



 बात उन दिनों की है जब मैं गुजरात के शहर सूरत में रहता था मेरे पिता सूरत में ठेकेदारी का काम करते थे मुझे सूरत में किराना की दुकान मेरे पिता ने लगाकर दी थी मैं अपनी स्नातक की पढाई पूरी कर चुका था दोस्तों समय जब अपना चक्र चलाता है तो वही निर्धारण करता है कि आपका भविष्य क्या होने वाला है परन्तु आपको इसमें उलझना नही चाहिए चूंकि समय चक्र है इसलिए उसके स्थिर होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता जैसे ही अनुकूल समय आपको अपना निर्धारण स्वयं करना चाहिए 16 दिसम्बर 2005 समय दोपहर के 2.00 बजे है उस समय दुकान पर  costumers का आना जाना न के बराबर होता है क्योंकि लोग उस समय या तो अपने कार्यस्थल पर लंच कर रहे होते हैं या फिर आराम तभी एक लड़की आती है
लडकी - बाबूजी Cadbury देना
कितनी?
लडकी- 2
मैंने दो कैडबरी उस लडकी को दी और वह लडकी चलती बनी मैं उसके इस बर्ताव से अवाक् रह गया परन्तु उसे रोक भी नहीं सका या यू कहिये कि उसे टोकने की हिम्मत नहीं कर सका क्यौंकि उसका पहनावे और बोल चाल से यह तो निर्धारण हो चुका था कि वह किसी न किसी संभ्रांत परिवार से ताल्लुक रखती है और फिर मेरी दुकान एक कालानी के अन्दर थी तो उसे दुवारा भी वही आना था  सो मै अपने काम पर लग गया दूसरे दिन उसी समय वहीं लड़की आती हैं
लडकी - बाबूजी Cadbury देना
कितनी?
लडकी- 2
मैंने दो कैडबरी निकाली परन्तु उसे दी नही और पूछा आपका नाम क्या है?
लडकी- क्या मतलब आपको क्या लेना? मैं सकपका गया
मेरे हाथ स्पर्श करते हुए कैडबरी लेकर वह चलती वनी मै जब तक  मैं सदमे से वाहर आता वो जा चुकी थी आप सोच रहे होंगे सदमा सदमा किस बात का अरे यार मुझे इस बात की कोई आशा नही थी कि मेरे इतना पूछते ही वह नागिन की तरह फुफकारेगी इसी बात से मैं झेप सा गया था उसने जाते वक्त गली में मुडने से ठीक पहले
मेरी तरफ़ मुस्कराते हुए कटीली नज़र से देखा उसका  यही देखना मुझे पता नहीं कुछ छू सा गया


अगले दिन मैं उसका इंतजार करता रहा वह नहीं आई उसके अगले दिन भी वह नहीं आई मेरी बैचेनी लगातार उसके लिए वढती जा रही थी जहाँ भी मैं कोई अनजान लड़की देखता मुझे लगता कहीँ यह वही तो नहीं  खैर दुकान का सामान पांडेसरा की एक दुकान से आता था  मैं  जीवन में कुछ और करना चाहता था उन दिनों गुजरात में एम्ब्रोडरी का google trend की तरह बडा ट्रेंड चल रहा था मेरी हमेशा से ट्रेंड के साथ चलने की रही है सो लगे हाथ मैंने भी एम्ब्रोडरी डिजाइन का कोर्स करना शुरू कर दिया मेरे पिता बचपन से लेकर आज तक हर फैसले में मेरे साथ रहते हैं सो मेरे निर्णय भी मैं स्वयं करने में सक्षम था और मैं निर्णय कर चुका था कि मुझे एम्ब्रोडरी डिजाइनर बनना है जैसे ही मै अपनी सीट पर बैठा मेरी नजर पास वाली कुर्सी पर पडी मैं मन ही मन चौंक पडा वो  लडकी वही बैठी एम्ब्रोडरी डिजाइनर का कोर्स करने बैठी थी
अब तो मेरा निर्णय और भी पक्का हो गया कि एम्ब्रोडरी डिजाइनर का भविष्य स्वर्णिम है इसलिए नहीं मैं बैठते ही एम्ब्रोडरी सीख गया था और और मुझे किसी मल्टी नैशनल कम्पनी का आफर मिल गया था वह इसलिए कि वहा मुझे वह मिल गई थी जिसे मैं महीनों से तलाश कर रहा था मेरी हालत indian cricket team के उस खिलाड़ी की तरह थी जो टीम में शामिल होते ही पहली ही बाल में छक्का मार दे तभी आवाज आई  किंजल किंजल नाम है मेरा गोपाल जी एक साथ दो दो  surprise कमाल है ठीक 6 माह बाद मिलने वाली लडकी इस तरह से मिलेगी मैंने सोचा भी नहीं था पर एक बात तो तय थी कि जिसने मेरे नाम से मुझे इस तरह बुलाया मतलब उसके दिल में मैं जगह वना चुका था


यह एक आफर है जहाँ से आप दीपावली सेल में शामिल होकर बेहतरीन खरीद कर सकते हो

जिस किंजल की मै बात कर रहा हूँ वह कोई सामान्य लड़की नही थी बला सी खूबसूरती एवं प्रखर बुद्धि की धनी थी वो मै उसके पूर्व में किये गए व्यवहार को लेकर छुब्ध था तभी आवाज आई कहा खो गये जनाब मैं आपसे ही कह रही हूँ इस प्रकार की वेवाकी से किसी लडकी द्वारा मेरे से जीवन में पहली बार बात की गई थी
सो मैं अवाक् सा रह गया  मैंने इधर उधर देखकर कहा जी..... कहिये वो मुस्कराई और वोली दोस्तों के बीच फारमलटी नही होती मैंने हडबडाते हुए पूछा दोस्त कौन दोस्त तभी वह अपनी सीट से खडी होकर आई और बोली अरे पगले तू और कौन और हंसने लगी..........लडकी.. आप यहाँ कैसे  कौन मैं मैं तो एम्ब्रोडरी डिजाइनर का कोर्स कर रहा हूँ पर आप... वह हसते हुए बोली same hai क्या मतलब मैंने पूछा तो वह कुछ नहीं फिर मिलते है  कहते हुए चली गयी मेरा रोम रोम प्रफ्फुलित हो रहा था 1 घंटे बाद हम सेण्टर से बहार आये कॉफ़ी पीते है उसने चहकते हुए कहा ...हम पास ही एक रेस्तरा में थे मैंने इत्मिनान से पूछा किंजल जी आपके पापा क्या करते है बोली आराम करते है फिलहाल तो हां पहले उनकी किंजल इंडस्ट्रीज के नाम से एक कंपनी चलती है ....... फिर मैंने पुचा और कौन कौन है मतलब ...आपके घर में माँ पापा और मै कॉफ़ी समाप्त होते ही वह चली गयी धीरे धीरे बातो का सिलसिला यु ही जारी रहा एक दिन अचानक उसने सूरत के समुद्री स्पॉट दुन्गास चलने के लिये कहा मैंने भी पता नहीं खुसी खुसी उसे हां कर दिया अगले ही दिन हम समुद्र की लहरों का  पूर्ण आनंद लेने में मस्त थे सारा दिन मौज मस्ती और खाने पीने में इकल गया पता ही नहीं चला  अँधेरा होने को था तो मैंने कहा चले वह वोली थिदी देर और रुकते है मुझे कुछ अजीव सी घबराहट होने लगी मैंने कुछ देर बाद मजबूती से घर चलने के लिये कहा तब जाकर वो राजी हुई  हम  समुद्र के किनारे बनी सड़क पर चलने लगे वो थोड़ी पीछे रुकी शायद उसके पैर में कुछ चुभ गया था जेसे ही हम   झाड़ियो के पास आये अचानक एक ट्रक पूरी स्पीड के साथ आया और उसे टक्कर मार दी टक्कर इतनी भयानक थी की वह हवा में उड़ते हुए दूर झाड़ियो में जा गिरी मै घबरा गया और मदद के लिये पुकारने लगा पर कोई नहीं रुका मेने मदद के लिये पुलिस कण्ट्रोल को सूचना दी सुचना पर पुलिश पहुच चुकी थी इंस्पेक्टर ने मेरे तरफ घूरते हुए कहा कहा किसने फोन किया था किसका एक्सिडेंट हुआ  मैंने घवराकर इंस्पेक्टर साहब को बताया की मेरी दोस्त थी और यहा से एक ट्रक ने उसे मेरी आँखों के सामने उडा  दिया  साहब  उदा दिया वो कोई गुब्बारा थी क्या इंस्पेक्टर ने मजाकिया अंदाज में कहा मै गुस्से से आग बबूला हो गया आपको शर्म नहीं आती इंस्पेक्टर साहब यहाँ मेरी दोस्त का एक्सीडेंट हुआ है और आपको मजाक सूझ रहा है वो तड़प रही होगी प्लीज उसकी मदद करो कहकर में मै उधर भागा  जहा उसे ट्रक ने उसे उछाला था तभी इंस्पेक्टर ने मुझे कालर से पकड़ते हुए कहा भागता कहा है डालो साले को गाड़ी में मजाक करने के लिये पुलिस ही मिली थी क्या कही शराब तो नहीं पी राखी है मै भोचक्का रह गया था आखिर पुलिश एसा केसे कर सकती है एक तरफ किंजल जिंदगी और मौत से जूझ रही है और  दूसरी तरफ मदद करने के बजाय पुलिश मुझे गिरफ्तार कर रही है उसके बाद मैंने इंस्पेक्टर को धमकी दी की यदि आपने अभी अभी के अभी मुझे नहीं छोड़ा तो मै आपकी नौकरी खा जाऊंगा ने........................इंस्पेक्टर  ने इतना सुनते ही मुझे जोरदार चांटा मारा और हंसकर बोला हलुआ है नौकरी खा जायेगा साले तस्करी के केस मै अन्दर डाल दूंगा सड़ते रहना जीवन भर उस दिन मुझे महसूस हुआ इंसान दरिंदगी की किस हद तक जा सकता है मै रोने 


लगा मेरी............ किंजल ....................को........... बचालो........... sir .............और मैंने रोते हुए इंस्पेक्टर के पैर पकड़ लियेलेकिन इंस्पेक्टर किसी से फ़ोन पर बात करने में ब्यस्त था मेरी हालत पिंजरे में फसी उस चिड़िया की तरह थी जो बाकी साथियों को जाल में फ़साने से बचाने के लिये क्रंदन करती है  तभी एक हैड कांस्टेबल बोला सर जिस प्रकार ये लड़का कह रहा है इसमें कुछ राज तो है सर तभी इंस्पेक्टर के मोबइल की घंटी बजी इंस्पेक्टर जी सर जी सर कर रहा था  इंस्पेक्टर बोला रतनी .........गाड़ी वापस लो मेरी जान में जान आगई मै उस हेड कांस्टेबल के प्रति असीम कृतग्यता  मह्सुश  कर रहा था तभी गाडी पुनः उसी स्थान पर आकर रुकी मै गाडी से उतरकर बदहवास उस तरफ दौड़ा जहाँ किंजल थी पीछे पीछे पुलिस भी दौड़ रही थी की कही मै भाग न जाऊ  जैसे ही मै वहा पहुंचा वहा बदबू आ रही थी और एक नर   कंकाल पड़ा था  मैंने उसे इग्नोर कर किंजल को तलाशना शुरू किया परन्तु किंजल वहा नहीं थी तभी जोरदार तमाचा मेरे गाल पर पड़ा अच्छा तो ये है कहानी पहले लड़की का मर्डर करता है और फिर कहानी गढकर पुलिस को गुमराह करना चाहता है तमाचा पडते ही जैसे मैं होश में आ गया था मैं रोड से दूर एक घने जंगल में था फिर किसने गाइड कर पुलिस वहा तक बुलबाया आखिर किंजल कहा गयी एवं जब रोड ही नही था तो एक्सीडेंट कैसे हो गया और भी बहुत कुछ तभी एक कानिस्टेवल चिललाया सर दो कंकाल और मिले दौड कर हम उधर गये इन्शपेक्टर ने तुरंत मुझे हथकड़ी लगायी और बोला और भी है या चले मैं मौन था तभी एक आवाज आई सर किसी का मोवाईल है इधर लाओ सर्च के बाद मुझे थाने लाकर जेल में बन्द कर दिया मुझे इससे कोई तकलीफ नही थी तकलीफ उन सवालों से थी जिनके जबाब मेरे पास नही थी तभी मोवाईल से प्राप्त वीडियो के आधार पर किंजल एवं उनके माता पिता की मौत साल भर पहले हुई थी  उनके असली कातिल पकडे़ गए मुझे छोड़ दिया गया परन्तु मैं बडबडा रहा था कौन थी वो
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Bhagat Singh (भगत सिंह




The ledgened of Bhagat Singh

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना वाजुए कातिल में है

भारत माता के सच्चे सपूतों का नाम आए और उस पर हमारे वीर युवा दिलों की धडकन शहीद भगत सिंह का नाम न आये यह नामुमकिन है यह पोस्ट उनके जन्म दिन के अवसर पर उनकों सादर समर्पित है

महात्मा गांधी जी के असहयोग आन्दोलन के पूरी तरह से असफल होने के बाद स्वतंत्रता संग्राम युवा पीढ़ी के हाथ में आ गया था बंगाल में अनुशीलन एवं युगांतर समितियों के साथ साथ सबका साथ मिलने लगा था इसी क्रम में अक्टूबर 1924 में कानपुर में एक सम्मेलन वुलाया गया जिसमें राजगुरु सुुखदेव शिव बर्मा आजाद जैसे तरुण नेताओं ने भाग लिया फलस्वरूप 1928 में hindustan republic associations Or army का जन्म हुआ था bangal bihar , up, Punjab, madras जैसे राज्यों में इनकी शाखाओं की स्थापना हुई






समय 17 दिसम्बर 1928  साईमन कमीशन के विरोध करने के वक्त लाहौर के दरोगा ने लाला लाजपत राय की निर्ममता से हत्या कर दी थी उसी का बदला लेने के लिए क्रांतिकारियों ने सांडर्स की हत्या कर दी जिसके बाद पुलिस द्वारा आमजन पर दमन चक्र चलाया गया  लोगों में यह भावना हो गयी कि लीडर तो बचकर निकल जाते हैं और आमजन दमन सहते हैं इसलिए भारत गणतंत्र सेना ने दो स्वयं सेवकों को गिरफ्तारी देने भेजा और भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली विधानसभा की खाली बैंचो पर बम धमाके के साथ अपनी गिरफ्तारी दी चूंकि विधानसभा में बम धमाके से पीड़ित व्यक्ति कोई नहीं था इसलिए सरकार द्वारा लाहौर कांड थोपकर तथा सुखदेव भगत सिंह एवं राजगुरु को 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गई
शहीद भगत सिंह का जन्म दिन 28 सितम्बर को मनाया जाता है परन्तु इनका जन्म 19 अक्टूबर 1907 को बताया जाता है आपकी माता का नाम विधावती कौर एवं पिता का नाम सरदार किशन सिंह था आप बचपन से ही राष्ट्र भक्ति से कूट कूट कर भरे थे आपका जन्म गाँव बंगा जिला यलपुर वर्तमान में पाकिस्तान में है
आपने जेल के अन्दर से लिखे लेखों में पूजीपतियो की आलोचना की आपकी कृति "मै नास्तिक क्यों हूँ" बहुचर्चित रही है

विश्व युद्ध की समाप्ति पर हार के साथ ही सरकार बैकफुट पर आ चुकी थी यदि उस समय महात्मा गांधी जी ने समझोते में इनको फांसी नहीं दिये जाने की मांग रखी होती तो भारत माता का यह लाल आज हमारे राष्ट्र को नयी दिशा दे गया होता माना जाता है कि उस समय पर आप बहुत लोकप्रिय नेता हो चुकें थे इस कारण राजनीतिको के लिए  आप सभी देशवासियों को राष्ट्र भक्ति का पाठ पढाकर चले
आपका बचपन भी वीरतापूर्ण कहानियों से भरा हुआ था आप शुरुआत से ही स्वतंत्रता के लिए छटपटा रहे थे उसी समय घटित जलियांवाला बाग हत्याकांड ने इस सरकार को उखाड़ फेंकने के संकल्प को चिंगारी देने का काम किया जिस समय अधिकांश लोग अपने जीवन को लेकर ऊहापोह में लगे रहते हैं आपका निर्णय स्पष्ट था और अल्पायु में ही आप सभी को बहुत बडा संदेश देकर चले गए 
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों..........................
यह बीर भगत सिंह की वह चिट्ठी है जिसे भगतसिंह ने फांसी से पूर्व  पंजाब के तत्कालीन गवर्नर को लिखी थी जिसमें भगत सिंह वेवाकी से लिखता है कि इंग्लैंड की सरकार और भारत की सरकार के मध्य युद्ध शुरू हो  चुका है और यह तब तक नहीं रुकेगा जब तक भारत से आपको उखाड़ कर फेकने  का काम नही हो जाता है
बीर भगत सिंह दूसरी बात लिखता है कि मैं कोई माफी वाफी नही मांग रहा क्यौंकि मैं जानता हूँ कि  might is always rights जो कि कोर्ट कार्यवाही के दौरान मैं देख चुका हूँ कुछ चापलूस नेताओं और अफसरों को देशभक्ति सिखाने के लिए मैं चाहता हूँ मुझे गोली मार दी जाए
खैर तुम भी मजबूर हो

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही नामोनिशां होगा 

वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्

01

Reclaiming the legend of Bhagat Singh

The shenanigans of the past week have pitched the martyred triumvirate of Bhagat Singh, Shivaram Rajguru and Sukhdev Thapar opposite Hindu ideologue Veer Savarkar as long gone nominees for the Bharat Ratna, looking to add to the growing track record of posthumous conferments of the country’s highest civilian award.
While these endowments have mostly occurred within a few years of an honouree’s demise, towering personalities like Vallabhbhai Patel, Jayaprakash Narayan, Gopinath Bordoloi or Madan Mohan Malviya have been bestowed their Presidential citations decades after their passing, often by partisan-minded governments attempting to score political points (as is essentially the case this week).
New production
Almost on cue, but likely programmed weeks in advance, a musical based on Singh’s short but impactful life will open this weekend as part of this year’s edition of the annual Prithvi Theatre Festival. Presented by the events company Tamboo, Gagan Damama Bajyo is written and directed by Piyush Mishra. Quite appropriately, the title refers to a Sikh battlefield refrain attributed to Kabir in the Guru Granth Sahib.
Penned in 1994, and helmed by N.K. Sharma for his theatre group, Act One, the play has since seen umpteen iterations — it is one of Mishra’s most performed scripts, alongside his Broadway adaptations in circulation. This new production marks the first time Mishra has taken over the reins of his play, and it comes after a hiatus of 16 years from the stage. In that period, the actor-composer has consolidated his position as one of Hindi cinema’s most multi-faceted talents.
The meticulously researched Gagan Damama Bajyo contributed substantively to Raj Kumar Santoshi’s historical, The Legend of Bhagat Singh (2002). The film’s dialogues were Mishra’s first writing credit for cinema. Tamboo’s revival opened in Delhi in September at the Shri Ram Centre. In keeping with the abbreviated life span of its subject (Singh died at just 23), it has a youthful cast of actor-singers who bring to the fore the idealism and passions of a new generation of non-conformists who attempted to take their country’s destiny into their own hands. There are only two female actors in a cast of sixteen, with Singh’s fiancée, Mannewali, making a fleeting but crucial appearance. The play, opens with the lamentations of a mother who has lost her sons, and is seen through the eyes of Shiv Verma, the last man standing among Singh’s collaborators when the play was first staged (Verma passed away in 1997).
Documenting struggle
The play’s narrative is completely non-linear, and Verma’s recollections take us all the way back to the tumultuous years from 1925 to 1931. The Kakori train robbery, the Central Assembly bombings, the inadvertent killing of John Saunders, the hunger strike in Lahore prison, and finally, the execution of Singh and his associates, all throw up a constellation of memorable characters in crisp white shirts and brown trousers — many of them young revolutionaries who have etched an indelible space for themselves in India’s freedom struggle. Mishra’s compositions are songs of rebellion that will emotionally amplify the fervour of a lost tribe’s allegiance to an unborn nation.
A telling phrase from the blurb states that the play, “breaks the fundamentalist image of [Singh] that people currently overuse and instead, shows him as a friend, a son, a lover and an intellectual.” Singh’s well-documented refusal of clemency stands in sharp contrast to Savarkar’s decamping from the freedom struggle, once released by the British from a colonial prison in Port Blair. There is great irony, therefore, to the latter being hailed as a nationalist icon by the powers-that-be. Singh’s patriotism was beyond reproach, but his strident ideological moorings of universal brotherhood, anarchism and atheism would mark him out as a stark misnomer in today’s political climate, which calls the lie on those across the left-to-right political spectrum who’ve tried to assert ownership over his legacy time and again. In restoring Singh to his every-man roots, Mishra’s play would likely allow him to be claimed by ordinary folk who lie outside these affiliations.
Gagan Damama Bajyo will premiere as part of the Prithvi Theatre Festival on November 3 at the Royal Opera House and be staged at Prithvi Theatre on November 4 and 5. For more details, see bookmyshow.com
02

Bhagat Singh death anniversary: 7 movies based on the life of Bhagat Singh

India’s famous freedom fighter Bhagat Singh sacrificed his life for the freedom of our country. He was just 23 years old when he along with Sukhdev Thapar and Shivaram Rajguru sacrificed their lives for India’s independence from the British rule on March 23, 1931. Bhagat Singh, Sukhdev, and Rajguru are considered one of the most influential revolutionaries. Even 87 years after their execution, their lives remain a great source of inspiration. The lives of these freedom fighters have not only inspired India’s independence movement but also Bollywood. Over the years, their lives have been an inspiration for several Bollywood movies. Martyrs’ Day, also known as Shaheed Diwas or Sarvodaya Day, is observed on March 23. On the occasion of 88th Shaheed Diwas, we have compiled a list of 7 Bollywood movies based on the lives of Bhagat Singh.
Rang De Basanti (2006)Directed by Rakeysh Omprakash Mehra, the literal meaning of the title ‘Rang De Basanti’ is ‘Paint me with the colours of spring’. The film features an ensemble cast comprising Aamir Khan, R Madhavan, Siddharth Narayan, Soha Ali Khan, Kunal Kapoor, Sharman Joshi, Atul Kulkarni and British actress Alice Patten. The movie revolves around the life of a group of friends who work together on a documentary film on the revolutionaries.
aamir khan_rang de basanti
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23rd March 1931: Shaheed (2002)The film ‘23rd March 1931: Shaheed’ features Bobby Deol as Bhagat Singh, Sunny Deol as Chandrashekhar Azad and Amrita Singh as Bhagat Singh’s mother. Aishwarya Rai Bachchan has a special appearance in a song. The film depicts the events leading up to the hanging of Bhagat Singh, Rajguru, and Sukhdev. The film coincided with the release of another film based on the life of Bhagat Singh titled ‘The Legend of Bhagat Singh’. Both the films didn’t work at the box office but were critically appreciated. Three movies based on the life of Bhagat Singh were released in the year 2002.
23rd march 1931 shaheed
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The Legend of Bhagat Singh (2002)Directed by Rajkumar Santoshi, the film features Ajay Devgn in lead role. ‘The Legend of Bhagat Singh’ beautifully portrays Bhagat Singh’s struggle for India’s independence and his views on the British Raj. The film begins with the scene where British attempts to dispose of Singh’s body and the film progresses with the flashback to the past to tell his story. The film has won two National Film Awards for Best Feature Film and three Filmfare awards.
The Legend of Bhagat Singh
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Shaheed-E-Azam (2002)The film ‘Shaheed-E-Azam’ features Sonu Sood essaying the role of Bhagat Singh. The film shows how Bhagat Singh decides to eliminate British Raj from India, how he plots several attacks on the colonial rulers and how the government sentences him to death for killing a British officer.
Story continues
Shaheed (1965)Directed by S Ram Sharma, ‘Shaheed’ features Manoj Kumar, Kamini Kaushal, Pran, Iftekhar, Nirupa Roy, Prem Chopra, Madan Puri and Anwar Hussain in lead roles. It was Manoj Kumar’s first patriotic film, followed by Upkar, Purab Aur Paschim, and Kranti. The film portrays the life of Bhagat Singh, Rajguru, and Sukhdev and how they went to the gallows at a young age. The sacrifices made by these revolutionaries eventually lead to India’s freedom from the colonial rule.
manoj kumar bhagat singh
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Shaheed Bhagat Singh (1963)Directed by KN Bansal, the film features Shammi Kapoor essaying the role of Bhagat Singh. Besides Shammi Kapoor, the film stars Shakeela, Premnath, Ulhas and Achla Sachdev. 
shammi kapoor_Shaheed Bhagat Singh (1963)
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Shaheed-e-Azad Bhagat Singh (1954)‘Shaheed-e-Azad Bhagat Singh is the first film based on the life of Bhagat Singh. Directed by Jagdish Gautam, the film features Prem Abeed, Jairaj, Smriti Biswas and Ashita Mazumdar in lead roles. The film also has the classic patriotic song ‘Sarfaroshi ki tamanna ab humare dil main hain..’ in Mohammed Rafi’s melodious voice.
Shaheed-e-Azad Bhagat Singh
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Today is the birth anniversary of the legendary Bhagat Singh.

Today is Bhagat Singh's birth anniversary and this reminded us of the time when two films on the freedom fighter released on the same day. Bhagat Singh has always inspired generations to be brave and not fear the outcome when it comes to someone's love for his country. That inspired two filmmakers to come up with a cinematic ode to the legendary freedom fighter by telling his story. And guess what? Both of them released on the same day, June 7, 2002.
The Legend Of Bhagat Singh, directed by Rajkumar Santoshi, had Ajay Devgn in the lead. The other one was 23rd March 1931: Shaheed which had Bobby Deol played the lead. This film was directed by Guddu Dhanoa. While both the films did an underwhelming performance at the box office, Ajay picked up a National Award for his act. Check out the trailers of the films here...
Interestingly, five films on the freedom fighter were up for grabs during that time. Shaheed-e-Azam had released a week before these two films on Bhagat Singh hit the theatres. There were more ready to be screened at that time. The case was similar to how every filmmaker was interested to make a film on Battle Of Saragarhi. Ajay Devgn and Karan Johar both had that in mind. Randeep Hooda even wandered around in the garb of Havildar Ishar Singh for his own film. Mohit Raina shot a TV series for the same. When Karan didn't back off, Ajay dropped his idea of the film and moved on to Tanaji. Guess such a thing is nothing new for Bollywood


Bayana fort  (किले) 



Bayana fort
Bayana fortwww.pmkishan.com
भारत के गौरवपूर्ण इतिहास में भारत के किलों का महत्वपूर्ण  स्थान है विविधता में एकता को  समेटे हुए यह देश विश्व के अन्य देशों के साथ अपने गौरवपूर्ण अतीत को अपने आंचल में संजोये है

Red fort of India (भारत के लाल किले)

















  
जब बात भारत के लाल किलों की हो तो दिल्ली एवं आगरा के साथ बयाना का नाम अनायास ही जुड जाता है बयाना वर्तमान में  india के क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बडे़ राज्य  Rajasthan के भरतपुर का एक उपजिला है यह  World sanctuary (घनापक्षी विहार भरतपुर)  से मात्र 52 km की दूरी पर स्थित एक प्रमुख कस्बा है यहाँ पर राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम की वस एवं भारतीय रेल की सेवाओं से आसानी से जाया जा सकता हैं बयाना गुप्त काल से पूर्व नील नगरी के नाम से जाना जाता था प्राचीनकाल में बयाना एशिया की सबसे बड़ी मंण्डी के रूप में जाना जाता था यहाँ पर एक खम्बा पर स्थित गरुड़ मंदिर विश्व की एकमात्र कलाकृति है उषा मंदिर, उषा मस्जिद, जहागीर दरवाजा, झजरी, सहित अनेको प्राचीन काल के एतिहासिक  दर्शनीय स्थल है


Bayana fort (बयाना का किला) 


Bayana fort
Red Fort Bayana
बयाना गुप्त कालीन नगर है परन्तु बयाना का किला महाभारत कालीन होने के प्रमाण मौजूद है भले ही पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस बात की पुष्टि नहीं कर पाया हो पर आम लोगों द्वारा इस बात की पुष्टि यहा मौजूद अन्य स्थानों के नाम के आधार पर की जाती रही है एक किवदंती के अनुसार यह महाभारत कालीन युद्ध स्थल रहा है पांडबो की विजय के उपरांत यहाँ का शासन नकुलबलदेव  को सुपुर्द कर दिया गया था उसके उपरांत 360 AD में यौद्धेय जनपद के महाराजा महासेनपति के शाशन किये जाने का उल्लेख यहाँ उपलब्ध शिलालेख के अनुसार पाया गया है इस किले श्रीपंथ, बाणासुर का किला, बिजयगढ, विजयमंदिरगढ, गोपालगढ, मंधीरगढ आदि अनेक नामों से प्राचीनकाल का भारत की एतिहासिक पुस्तकों में पाया जाता है इसके पश्चात 372 AD में बिष्णुबर्धन द्बारा पुण्डरीक के self sacrifice का उल्लेख मिलता है बिष्णुबर्धन  समुद्र गुप्त का जागीरदार था
बयाना की रमणीक सुन्दरता इस किले में चार चाँद लगाने का कम करती है यहाँ प्राकृतिक सौंदर्य अनुपम है 
Bayana fort
Devnarayan girls college Bayanawww.pmkishan.com

अरावली की पहाडियों के मध्य बना यह किला सामरिक द्रष्टि से उत्तरभारतीय राजाओ के लिये बड़ा मह्त्त्बपूर्ण रहा है १५२७ ईश्वी में मुगलों की भारत में राज्य सत्ता की स्थापना का निर्णायक युद्ध खानुआ में लड़ा गया जिसमे बाबर विजयी हुआ था ततात्कालिक समय पर यह किला मेवाड़ शाशक राणा सांगा के अधिकार क्षेत्र में आता था १५२६ में जब राणा सांगा  एवं बाबर के मध्य बयाना का युद्ध लड़ा गया तो उसमे राणा सांगा विजयी हुआ था माना जाता है की यह किला अजेय रहा है 

Bhimlaat
Bhimlaat Bayana fortwww.pmkishan.com
इसके आसपास लगभग शताधिक गुर्जरों के गाँव स्थित है गुर्जर समुदाय प्राचीन काल से ही प्रखर योध्धा के रूप में जाना जाता है जो इस किले की अजेयता का महत्तबपूर्ण कारक भी है यहाँ पर ग्यारहवी शताब्दी से पूरब गुर्जर प्रतिहार वश शाशन कर्ता था ३७०-७१ में विश्व का प्रथम विजय स्तम्भ समुद्रगुप्त द्वारा यहाँ पर स्थापित किया गया था वर्धन वंश के शाशक द्वारा पुंणरीक की याद में लाल एकाश्म पत्थर से निर्मित स्तम्भ जिसे आज भीमलाट के नाम से जाना जाता है यह एक 26.3 फीट ऊंचा स्तम्भ हैं इसका प्रथम भाग अष्टकोणीय है जो 22.7 फीट ऊंचा है शेष भाग गोलाकार है इसके शिखर पर लगी धातु शलाका सम्भवतः राज्य की ध्वज पताका फहराने के लिए लगाई गई थी fort of jaisalmer interior की तरह ही इस किले की  interior भी दर्शनीय है

किले की पुष्ट चार दीवारी का कार्य  निर्माण गुर्जर प्रतिहार वंश के शाशक राजा महिपाल गुर्जर के शाशनकाल में करबाया गया राजा महिपाल के शाशनकाल में लक्ष्मण सैन की पत्नी चित्रलेखा ने उषा मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था बयाना स्थित उषा मंदिर का निर्माण महाभारत काल में हुआ जो की भूमि के अन्दर आज भी सुरक्षित दशा में है प्राप्त पांडू लेखो के अनुशार महिपाल गुर्जर छावडी गोत्र से आते है बी .ए .स्मिथ के अनुसार भीनमाल शाखा के शाशक ब्याघ्रमुख[ 690-642] छावडी वंश के प्रथम शाशक थे यह गुजरात का प्रमुख राजवंश था  महिपाल गुर्जर के पुत्र विजय पाल द्वारा 999 ईसवी से 1043 ईश्वी तक यहाँ शाशन किये जाने के प्रमाण प्राप्त हुए है  जिनके पुत्र नहपाल द्वारा नहरौली बसायी गयी थी आज भी किले के आसपास इस गोत्र के लोगो के 8 गाँव बसे हुए है  961 ईश्वी में जब दिल्ली के राजा गोपाल देव थे जो की गुर्जरों के तंवर गोत्र से आते थे परन्तु उच्चारण त्रुटी के कारण उन्हें तोमर कहा जाता था राजा के साथ गोत्र लगाने की चाहत में अनेको समर्थको द्वारा गोत्र {यह एक सरनेम है } लगाये जाते थे इतिहास को तोड़ मरोड़कर पेश किये जाने की प्रबृति तात्कालिक इतिहासकारों में पायी जाती थी इसी भ्रम के कारण यह सब घटित हुआ एसे भी इस बात से  कोई ताल्लुक नहीं है की अनंगपाल तोमर था या तंवर यहाँ पर उल्लेखित विन्दु यह है कि गोपालदेव तंवर के वंशजो द्वारा तंवर गोत्र के गाँव यहाँ वसाए गए जिनके 12 गाँव आज भी किले के आस पास मौजूद है  
Gulab kund Bayana fort
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गुलाब कुंड 
जन मान्यताओ के अनुसार इस वावडी का निर्माण किले के निरमाण के साथ ही करवाया गया था यह किले में एकमात्र पेयजल का उपलब्ध श्रोत है इस वावडी का जल कभी सूखता नहीं है इसका पुनुरुधार श्री गुलाब जी द्वारा करवाया गया था इसलिए आज लोग इस वावडी को गुलाब वावडी के नाम से जानते है वर्तमान में पुरातत्व विभाग की उपेक्षा का शिकार यह किला अपने अस्तित्व के लिये लड़ता हुआ नजर आ रहा है 
Barahdari Bayana fort
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यहाँ का एक प्रमुख आकर्षण यहाँ पर स्थित एक बारह खम्बो पर स्थित दो मंजिला भवन है जिसे बारहदरी के नाम से जाना जाता है 


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जाति और धर्म क्या है❓

Towards humanity (मानवता की ओर संदेश) :- मानव प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कृति है  मानव ही पृथ्वी पर एक ऐसा प्राणी है  जो कि सभी की भावना को समझ सकता है। हम सब प्रकृति में ही पलते बढ़ते है अन्ततः प्रकृति में ही विलीन होते हैं । आखिर क्यों मानव  मानव  में भेद है  कोई अमीर, गरीब ,काला, गोरा, उच्च कुल,निम्न कुल, भिन्न जाति, धर्म, लिगं आखिर किसने बनाया ये सब ताना बाना  , प्रकृति ने तो  नहीं बुना ये ताना बाना आखिर किसने ❓ यह बात हम सब जानते हैं फिर भी ये सब करते हैं बड़े शौक से और  प्रदर्शित भी करते हैं। आपस में एक दूसरे को उच्च निम्न साबित करने में लगे हैं और तो और कुछ लोग तो जाति एवं धर्म के नाम पर हत्याये भी कर देते हैं जब प्रकृति ही जीवों में भेदभाव नहीं करती तो हम मानवों में क्यों ।  मेरा मानना है कि  सभी  को जियो और जीने दो की भावना पर बल देेेते हुए मानवतावाद पर बल देना चाहिए ताकि जीवन को बेेेहतर बनाने के बारे में तरह  तरह  सम्भावनाओ पर बल दिया जा सकें
इस प्रकार की वेवजह वेबकूफी का जीवन से कोई ताल्लुक नहीं है परन्तु मुझे लगता है कि जीवन को सही मायने में समझा ही नहीं गया क्योंकि जीवन हमेशा हर जगह एक ही रूप में मौजूद रहा है दुर्भाग्य से कुछेक स्वार्थी लोगों के द्वारा इसे इतना जटिल वना दिया गया है  बैसे मानव की जीवन को विभेदित करने की प्रवृति रही है पहले सजीव और निर्जीव फिर जलचर थलचर एवं नभचर फिर जीव जन्तु एवं मानव फिर नर नारी यहाँ तक जो वर्गीकरण किया गया उसके पीछे एक तार्किक सोच थी परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब उतपन्न हुईं जब इंसान ने मानवता के टुकड़े करने की कोशिश करना शुरू शुरू में नर और नारी फिर गरीब अमीर कमजोर ताकतवर के रूप में इंसान का वर्गीकरण सामने आया


                   मानवतावादी सोच धीरे धीरे धर्म की ओर वढती गई तथाकथित बुद्धिजीवियों ने अपनी अपनी सुविधा के अनुसार ईश्वरौ का वर्गीकरण कर लिया बात यहाँ तक भी नहीं रुकी एवं जीवन के निम्नतम स्तर वर्ण व्यवस्था एवं जातियों का अविष्कार किया गया ताकि अपने आप को सर्वश्रेष्ठ  साबित किया जा सके परिणाम स्वरूप इंसान के द्वारा संचालित संसार से इंसानियत समाप्त होतीं चली गई


जरा सोचिए सम्पूर्ण अनन्त ब्रह्माण्ड की रचना करने बाला परमात्मा क्यों कहा जाता है परममानव क्यों नहीं ऐसा इसलिए है कि हम जानते हैं कि सिर्फ मानव ही इस सृष्टि की रचना नहीं है तो फिर हमें यह भी जानना चाहिए या यूँ कहिये कि जानना पडेगा कि यदि इंसानों का ईश्वर इंसान जैसा होता तो जानवरों का ईश्वर कोई बडा सा जानवर होता फिर आपके वर्गीकरण के अनुसार तो जलचर थलचर एवं वर्ण व्यवस्था एवं जातियों तक अनगिनत ईश्वर होते क्या एसा मानना मूर्खता नहीं तो और क्या है
इस सम्पूर्ण सृष्टि में सिर्फ और सिर्फ जीवन का अस्तित्व है और अस्तित्व का वर्गीकरण किसी भी रूप में किया जाना निहायत वेबकूफी भरा काम होगा  जीवन का काम सिर्फ जीवन ही है
मोक्ष सिर्फ अस्तित्व को जानना है मानना नहीं आप सभी से आशा है आप सृष्टि में जो भी जैसा घटित होता है उसे वैसा ही देखने का प्रयास करेंगे


 दवाईयों से परहेज करें

आज भागदौड़ भरी जिंदगी में अनियमित दिनचर्या एवं चिकित्सा उद्योग की सफलतम marketing के कारण 💊 अर्थात ड्रग्स लेना जीवन का अंग वन गया है जबकि स्वास्थ्य के लिए दवाईया लेना आवश्यक नहीं है आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि 70 प्रतिशत परिवार अपने जीवनकाल में भोजन से अधिक चिकित्सा पर खर्च कर रहे हैं यह किसी भी रुप में सही नहीं है आजकल चिकित्सा उद्योग का उद्देश्य सेवा नहीं होकर शत प्रतिशत उद्योग रह गया है मुझे लगता है किआज चिकित्सा उद्योग वुलन्दियों पर सिर्फ अपनी काबिलियत के कारण नहीं होकर हमारी नासमझी के कारण है मेरा मानना है कि आप लोग चलकर कभी भी डाक्टर के पास नहीं जाए क्योंकि यह एक वडा माफियाओं का जाल जिसमें आप जा तो सकते हो पर लौटने का रास्ता नहीं के बराबर है चिकित्सा क्षेत्र में 80 प्रतिशत लोग अप्रशिक्षित है 
आपने कभी सोचा है कि जिस ईश्वर ने आपको बनाया है उसने इस शरीर को ऐसी शक्ति क्यों नहीं दी कि वह अपने आप स्वस्थ्य हो सके आप गलत है ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति को यह शक्ति दी है आप जानते होंगे कि आपका लिवर आपके द्वारा ली जाने वाली ड्रग्स का जमकर मुकाबला करता है और शरीर के अन्दर जाने से रोकने का भरसक प्रयास करता है परन्तु आप स्वयं विना बजह या मामूली तकलीफ के कारण दवा गटक जाते है। आज ऐसा लगता है कि प्रत्येक घर में एक medicine cabinet चल रही है
                                                               

Medicine jaal 

Doctors are second God of the earth चिकित्सक भगवान का दूसरा रूप होता है लेकिन आधे से अधिक चिकित्सकों द्धारा यह जाल बुना गया है समझते हैं कैसे आपको  हल्का सा सरदर्द हुआ आपने ड्रग्स ली कोई भी अब आपको आपका दिमाग सरदर्द के बारे में सूचना देना बंद कर देगा आप समझे सर दर्द ठीक हो गया है परन्तु अब ड्रग्स के साइड इफेक्ट्स को समझें यानि कि आपको इस ड्रग्स के सेवन करने से हार्ट अटैक हो सकता है परन्तु नहीं हुआ न ईश्वर का शुक्र है परन्तु आप अभी भी सुरक्षित नहीं हो आपको पहले दिन किसी दुर्घटना के कारण सरदर्द से पीड़ित थे परन्तु अब ड्रग्स के साइड इफेक्ट्स के कारण अवसाद के कारण सरदर्द से पीड़ित हो फिर आपने ड्रग्स ली फिर साइड इफेक्ट्स के कारण सरदर्द हुआ फिर आपने ड्रग्स ली फिर सरदर्द अब यह नियमित रूप से पीड़ित व्यक्ति हैं आप इस प्रकार चिकित्सा उद्योग के जाल में फंसे हुए हैं
दैनिक रूप से मैं प्रमाण सहित इस बिषय पर समाधान सहित आपको बताता रहुंगा


Chandrayaan-2 a space shuttle of India

Chandrayaan- 2
Chandrayaan- 2

आज विश्व के हर कोने में एक चर्चा हैं कि इसरो ने अचानक से ऐसा कैसे कर दिया जिस देश में आज भी बीमार व्यक्ति को 5 -5 किलोमीटर तक चारपाई पर रखकर अस्पताल तक पहुँचाया जाता है उस देश के बैज्ञानिकौ ने चांद पर अपना यान सफलतापूर्वक कैसे भेज दिया
चांद पर यान भेजने का मतलब है भारत एक शक्तिशाली देश बन गया है जहाँ तक रोवर से पुनः सम्पर्क स्थापित करने का सवाल है यह नामुमकिन है आप सोच रहे होंगे अचानक ऐसा क्या हुआ कि लैंडर अपने पथ से विचलित हो गया इसके पीछे तीन सम्भावना है किसी शत्रु देश द्वारा घुसपैठ आर्टिफिशियल इन्टेलीसेन्स द्वारा यान का स्वयं पथ परिवर्तन या चांद के दक्षिणी ध्रुव की संरचना
जो भी चांद पर फतेह की जा चुकी है आगे आगे देखिये होता है क्या❓




Is any human chandrayaan- 2

सवाल उठाने के लिए बहुत कुछ नहीं है परन्तु आप सभी को यह जानने का हक भी है कि चन्द्र यान में मानव हैं भी या नही इसका जबाब है नहीं क्यौंकि आरटिफिशियल इन्टेलीसेन्स के इस जमाने में मानव की तरह जब एक मशीन से काम हो सकता है तो मानव जीवन को खतरे में डालना तर्क संगत नही होता परन्तु दुर्भाग्य से यह मिशन एक अधूरेपन का अहसास दिलाता है वैसे यह एक अवसर भी है कुछ बेहतर करने का और पुनः स्थापित करने का आशा है शीघ्र ही हम एक कामयाब मिशन की ओर जाएगें
Chandrayan-2
Chandrayan-2

What is the main objective of chandrayan -2

चन्द्र यान 2 के महत्वपूर्ण लक्ष्य है चन्द्रमा की सतह पर चन्द्रमा की मिट्टी का बैज्ञानिक विशलेषण तथा आबोहवा का परीक्षण करना है
इस मिशन के बाद में सिर्फ मिट्टी की जांच को छोड़कर शेष लक्ष्य प्राप्त हो गया है
01

India reveals Chandrayaan-2 Vikram moon lander crashed

a man standing in front of a building: The Chandrayaan-2 Vikram lander and rover before they went to the moon. ISRO© Provided by CBS Interactive Inc. The Chandrayaan-2 Vikram lander and rover before they went to the moon. ISRO
India's Chandrayaan-2 Vikram lander crashed during an attempted moon landing, the nation has acknowledged. In a new report, the Indian government's Department of Space said the Vikram moon lander separated as planned on Sept. 2, but then braked too hard when it came to descending to the surface on Sept. 7.
a person standing in front of a building: The Chandrayaan-2 Vikram lander and rover before they went to the moon.© CNET
The Chandrayaan-2 Vikram lander and rover before they went to the moon.
"After two successful de-orbiting maneuvers, powered descent of the lander was initiated on 7th September 2019 to achieve soft landing on the moon surface," according to the report, which NPR reported earlier Wednesday and was in response to a lawmaker's inquiry last week.
The descent's first phase took the lander from 30km to 7.4km above the surface of the moon, with velocity reduced from 1,683m/s to 146m/s. But during the second phase of descent, "the reduction in velocity was more than the designed value."
"Due to this deviation, the initial conditions at the start of the fine braking phase were beyond the designed parameters," the government said. "As a result, Vikram hard landed within 500m of the designated landing site."
The Indian space department added all eight of the orbiter's scientific instruments are performing as planned, however, and it has increased its mission life to seven years.
Late last month, the lander was still missing despite NASA's search efforts. The Indian Space Research Organization had lost communication with the lander shortly before it was set to land on the moon. NASA's Lunar Reconnaissance Orbiter had scanned the expected landing since mid-September, but hadn't been able to spot the lander, which was meant to investigate the unexpected south pole of the moon.
"It is possible that Vikram is located in a shadow or outside of the search area.  Because of the low latitude, approximately 70 degrees south, the area is never completely free of shadows," NASA said in a statement last month.
a star in the background: The fantastically named "super blood wolf moon" of Jan. 20 and 21 was a stunner combining a total lunar eclipse (blood) with January timing (wolf) and a particularly large appearance due to being closer to the Earth (super).The Kalamazoo Astronomical Society in Michigan delivered an extraordinary set of images showing the moon and the occasional twinkling star around it. The society describes this shot as "cropped and slightly processed." SpaceX founder Elon Musk even shared one of the KAS images, which more than doubled the society's follower count on Twitter.
The fantastically named "super blood wolf moon" of Jan. 20 and 21 was a stunner combining a total lunar eclipse (blood) with January timing (wolf) and a particularly large appearance due to being closer to the Earth (super).The Kalamazoo Astronomical Society in Michigan delivered an extraordinary set of images showing the moon and the occasional twinkling star around it. The society describes this shot as "cropped and slightly processed." SpaceX founder Elon Musk even shared one of the KAS images, which more than doubled the society's follower count on Twitter.
© Provided by CBS Interactive Inc.
02

Chandrayaan-2's Vikram hard landed within 500 metres of touchdown site, says govt.

Chandrayaan-2’s Vikram lander hard landed as reduction in velocity during its descent did not match with the designed parameters, the government said on Thursday, throwing more light on the ISRO’s dashed hopes of making a soft landing on the lunar surface in its maiden attempt.
In a written reply to a question in the Lok Sabha, Jitendra Singh, Minister of State in the Prime Minister’s Office who looks after the Department of Space, said the first phase of descent was performed nominally from an altitude of 30 km to 7.4 km above the moon’s surface and the velocity was reduced from 1,683 metres per second to 146 metres per second.
“During the second phase of descent, the reduction in velocity was more than the designed value. Due to this deviation, the initial conditions at the start of the fine-braking phase were beyond the designed parameters. As a result, Vikram hard landed within 500 metres of the designated landing site,” he said.
Mr. Singh, however, said most components of technology demonstration, including the launch, orbital critical manoeuvres, lander separation, de-boost and rough braking phase were successfully accomplished.
With regards to the scientific objectives, all the eight state-of-the-art scientific instruments of the orbiter were performing according to the design and providing valuable scientific data. Due to the precise launch and orbital manoeuvres, the mission life of the orbiter was increased to seven years, he said.
Data received from the orbiter was being provided continuously to the scientific community, he said, adding the same was recently reviewed in an all-India user meet organised in New Delhi.
The indigenously developed Chandrayaan-2 comprising the orbiter, the lander and a rover was successfully launched onboard the indigenous GSLV MK III-M1 Mission on July 22.
After accomplishing four earth-bound manoeuvres and trans-lunar injection, the spacecraft was successfully inserted into the lunar orbit on August 20. A series of moon-bound manoeuvres were then carried out to achieve a lunar orbit of 119 x 127 km.
Vikram was separated, as planned, from the orbiter on September 2, 2019. After two successful de-orbiting manoeuvres, a powered descent of the lander was initiated on September 7 to achieve soft landing on the Moon surface.
The ISRO is planning to launch Chandrayaan-3 probably in November next year.
 
03

India finally admits its Moon lander crashed two months after it was destroyed

a close up of a rock: moonthingy© Provided by Penske Media Corporation moonthingy
India was poised to make history in September by becoming one of just a handful of nations to achieve a soft landing on the Moon. Everything was going smoothly… until it didn’t. Just moments before the Chandrayaan-2 lunar lander was supposed to touch down, its handlers back on Earth lost all contact with the spacecraft.
It wasn’t immediately clear what had happened to the lander, and the Indian Space Research Organization (ISRO) was hopeful that the spacecraft survived its impact. It tried to spot the lander on the surface but failed to detect it and, even after NASA’s own orbiter scanned the surface, the fate of Chanrayaan-2 remained unknown. Now, two months after the lander was presumed destroyed, ISRO is acknowledging that the spacecraft is gone forever.
As NPR reports, the Indian government has finally broken its silence on the death of the spacecraft, following questions from lawmakers who were eager to learn its fate.
“During the second phase of descent, the reduction in velocity was more than the designed value. Due to this deviation, the initial conditions at the start of the fine braking phase were beyond the designed parameters,” Jitendra Singh of India’s Department of Space, explains. “As a result, Vikram hard landed within 500 m of the designated landing site.”
The Chandrayaan-2 mission also saw the insertion of a lunar orbiter prior to the deployment of the lander. The orbiter has been performing well for ISRO, but obviously, the group would have liked to have accomplished the soft landing they set out to achieve. The team spent a significant amount of time trying to wake the spacecraft back up and resume communication even after it was thought to have crashed, but those attempts were met with only silence.
It’s clear that the lander couldn’t handle the conditions it was met with during landing and failed as a result. Whether this was due to a failure of the lander’s own systems or an anomaly in how the spacecraft reacted is unkno